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गवाह टूटे, केस छूटे! क्या अपराधियों के आगे बेबस है झारखंड पुलिस?

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गवाह असुरक्षित, न्याय अधूरा! झारखंड में क्यों टूट रही न्याय व्यवस्था की सबसे अहम कड़ी?

राष्ट्रीय समाचार डेस्क :-अपराध की दुनिया में एक पुरानी कहावत है—”अगर गवाह टूट गया, तो केस छूट गया।” झारखंड में यह कहावत कई गंभीर आपराधिक मामलों में सच साबित होती दिखाई दे रही है। हत्या, रंगदारी, उग्रवाद, अवैध खनन, भ्रष्टाचार और संगठित अपराध के मामलों में पुलिस आरोपियों को गिरफ्तार कर चार्जशीट तक दाखिल कर देती है, लेकिन अदालत में मुकदमे की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी यानी गवाह अक्सर दबाव, डर, धमकी या हमलों का शिकार हो जाते हैं। परिणामस्वरूप कई मामलों में आरोपी सबूतों के अभाव में बरी हो जाते हैं और न्याय अधूरा रह जाता है।

गवाहों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल

झारखंड में गवाहों की हत्या, हमलों या धमकियों का कोई समेकित सरकारी आंकड़ा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है, लेकिन पिछले वर्षों की घटनाएं इस समस्या की गंभीरता को उजागर करती हैं। कई मामलों में गवाहों को अदालत तक पहुंचने से पहले ही चुप करा दिया गया या वे भय के कारण अपने बयान से मुकर गए।

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी आपराधिक मुकदमे में गवाह की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। यदि गवाह ही सुरक्षित नहीं होगा तो अपराधियों को सजा दिलाना बेहद मुश्किल हो जाता है।

हाईकोर्ट भी जता चुका है चिंता

मार्च 2026 में झारखंड हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि आठ वर्षों तक एक भी गवाह की गवाही नहीं हो सकी और मुकदमा लंबित पड़ा रहा। अदालत ने जांच एजेंसियों और अभियोजन पक्ष की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए नाराजगी व्यक्त की थी।

यह टिप्पणी केवल एक मामले तक सीमित नहीं थी, बल्कि राज्य की न्यायिक व्यवस्था के सामने मौजूद एक बड़ी चुनौती को उजागर करती है।

जहां गवाही देना बन जाता है जान जोखिम में डालना

चतरा, लातेहार, पलामू, खूंटी, पश्चिमी सिंहभूम, गुमला, लोहरदगा, धनबाद और पूर्वी सिंहभूम जैसे जिलों में उग्रवाद, गैंगवार और रंगदारी से जुड़े मामलों में गवाहों पर दबाव की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं। कई लोग पुलिस के समक्ष बयान तो दर्ज कराते हैं, लेकिन अदालत में पहुंचने तक उनका साहस जवाब दे जाता है।

कई मामलों में यह भी पाया गया है कि अपराधी गिरोह जेल के भीतर से भी अपना नेटवर्क संचालित करते हैं और गवाहों को धमकाने का प्रयास करते हैं। इससे आम लोगों का न्याय प्रणाली पर भरोसा कमजोर पड़ता है।

झारखंड की कुछ प्रमुख घटनाएं

  • 29 मई 2022 – जमशेदपुर

पूर्वी सिंहभूम जिले के जमशेदपुर में एक आपराधिक मामले के गवाह मनप्रीत पाल सिंह की घर में घुसकर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। घटना ने पूरे राज्य को झकझोर दिया था। मामले पर झारखंड हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार से गवाह सुरक्षा व्यवस्था पर जवाब मांगा था।

  • 29 जून 2022 – देवघर कोर्ट परिसर

देवघर न्यायालय परिसर में हुई गोलीबारी की घटना ने अदालतों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे। सुनवाई के दौरान न्यायिक परिसरों की सुरक्षा को लेकर चिंता व्यक्त की गई थी।

  • वर्ष 2023 – नक्सली मामलों में गवाही का संकट

जेजेएमपी नक्सली संगठन से जुड़े मामलों में कई गवाहों के सामने नहीं आने और बयान बदलने की घटनाएं सामने आईं। पुलिस और न्यायालय ने इसे न्याय प्रक्रिया के लिए गंभीर चुनौती माना था।

  • वर्ष 2024 – पलामू

एक गैंगस्टर से जुड़े मामलों में गवाहों को धमकियां मिलने का मामला सामने आया था। प्रभावित परिवार ने पुलिस को लिखित सूचना देकर सुरक्षा की मांग की थी।

  • 22 फरवरी 2025 – चतरा

एनआईए के सरकारी गवाह बिशुन साव का अपहरण कर हत्या कर दी गई। बाद में उनका शव जंगल से बरामद हुआ। यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना और गवाह सुरक्षा व्यवस्था पर फिर सवाल उठे।

  • लातेहार – नियामत अंसारी हत्याकांड

मार्च 2011 में मनरेगा घोटाले का खुलासा करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता नियामत अंसारी की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी। बताया गया था कि उन्हें पहले से धमकियां मिल रही थीं।

  • खूंटी और उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र

पीएलएफआई और अन्य उग्रवादी संगठनों से जुड़े मामलों में ग्रामीणों द्वारा खुलकर गवाही देने से बचने की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं।

विटनेस प्रोटेक्शन स्कीम: दावा बनाम हकीकत

देश में गवाहों की सुरक्षा के लिए विटनेस प्रोटेक्शन स्कीम लागू है, जिसका उद्देश्य संवेदनशील मामलों के गवाहों को सुरक्षा प्रदान करना है। लेकिन जमीनी स्तर पर इसके प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठते रहे हैं।

कई मामलों में गवाहों का आरोप रहा है कि उन्हें पर्याप्त सुरक्षा नहीं मिलती, जबकि कुछ मामलों में सुरक्षा मिलने के बावजूद अपराधियों का भय बना रहता है।

सबसे बड़ा सवाल

  • यदि राज्य एक गवाह की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकता, तो आम नागरिक अपराधियों के खिलाफ सामने आने का साहस कैसे जुटाएगा?
  • न्याय व्यवस्था की सफलता केवल पुलिस की गिरफ्तारी या चार्जशीट तक सीमित नहीं है। असली परीक्षा अदालत में होती है, जहां गवाहों की सुरक्षित और निर्भीक गवाही ही अपराधियों को सजा तक पहुंचा सकती है।

झारखंड में लगातार सामने आ रही घटनाएं यह संकेत देती हैं कि गवाहों की सुरक्षा अब केवल कानूनी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक और सामाजिक विश्वास का भी बड़ा प्रश्न बन चुकी है।

Ashish Yadav

Author: Ashish Yadav

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