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खेतों से लुप्त होती बैलों की जोड़ी, घंटियों की गूंज हुई शांत

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ट्रैक्टरों के शोर में खोती जा रही है बैलों की मीठी घंटियों की झंकार

आशीष यादव कि कलम से।

चुरचू / चरही (हजारीबाग):-एक दौर था जब सुबह होते ही खेतों में बैलों के गले में बंधी घंटियों की मधुर आवाज सुनाई देती थी, जो यह संकेत देती थी कि किसान अपने हल-बैल के साथ खेतों में उतर चुके हैं। यह सिर्फ एक ध्वनि नहीं थी, बल्कि ग्रामीण जीवन का एक जीवंत प्रतीक थी, जिसमें मेहनत, परंपरा और आत्मीयता की झलक मिलती थी।लेकिन समय के साथ तकनीक ने कृषि जीवन को पूरी तरह बदल दिया है। अब खेतों में बैलों की जगह ट्रैक्टरों की आवाज गूंजती है। ट्रैक्टर, जो कभी केवल अमीर किसानों तक सीमित था, आज छोटे और मझोले किसानों की भी पहली पसंद बन गया है। तेज गति, कम समय में ज्यादा काम और श्रम की बचत ने किसानों को मशीनों की ओर मोड़ दिया है।यह बदलाव भारतीय कृषि में क्रांति लेकर आया है। निश्चित रूप से इससे खेती की उत्पादकता बढ़ी है, लेकिन इसके साथ ही एक संस्कृति, एक परंपरा और एक आत्मीय रिश्ता भी धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है। गाँव के हाट-बाजारों में अब बैलों की खरीदारी पहले जैसी रौनक नहीं लाती। युवा किसानों की पीढ़ी शायद ही कभी बैलों से खेती करती नजर आती है।कभी बैलों को परिवार का हिस्सा माना जाता था — उन्हें नहलाना, सजाना, तीज-त्योहारों में रंग-बिरंगे कपड़े पहनाना आम बात थी। पर अब वही बैल उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं। कई किसान अब उन्हें पालने से बचते हैं क्योंकि ट्रैक्टर अधिक “सुविधाजनक” हो गया है।यह आधुनिकता का एक चेहरा है, जो प्रगति की कहानी तो कहता है, पर इसके पीछे परंपरा और आत्मीयता की एक धीमी मौत भी छुपी हुई है। खेतों में अब बैलों की मद्धम चाल और घंटियों की झंकार नहीं, बल्कि ट्रैक्टर के इंजन की तेज़ गूंज सुनाई देती है।यह बदलाव स्वागत योग्य है, लेकिन इसके साथ ही यह सवाल भी उठाता है — क्या हम प्रगति के नाम पर अपनी विरासत को खोते जा रहे हैं?

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