सरकारी इंतजार छोड़ ग्रामीणों ने खुद संभाली सड़क की कमान, 250 आदिवासी कर रहे श्रमदान
पांच किलोमीटर लंबे जर्जर रास्ते को दुरुस्त करने में जुटे हेसाकोचा गांव के ग्रामीण, गर्भवती महिलाओं और मरीजों को खाट पर लादकर पहुंचाना पड़ता है अस्पताल
हजारीबाग: सरकारी योजनाओं और विकास के दावों के बीच हजारीबाग जिले के एक आदिवासी गांव की तस्वीर व्यवस्था की जमीनी हकीकत बयां कर रही है। टाटीझरिया प्रखंड की बेडम पंचायत स्थित सुदूरवर्ती हेसाकोचा गांव के ग्रामीणों ने सड़क निर्माण की उम्मीद में वर्षों तक इंतजार करने के बाद अब खुद ही अपनी समस्या का समाधान करने की पहल शुरू कर दी है। गांव के करीब 25 परिवारों के लगभग 250 आदिवासी महिला, पुरुष और युवा पिछले पांच दिनों से श्रमदान कर जंगल के बीच गुजरने वाले करीब पांच किलोमीटर लंबे जर्जर रास्ते को चलने लायक बनाने में जुटे हैं। ग्रामीणों ने सरकारी सहायता का इंतजार करने के बजाय अपने श्रम और सामूहिक प्रयास से रास्ते की मरम्मत का बीड़ा उठाया है।
गांव में सुबह होते ही महिला, पुरुष और युवा अपने दैनिक कार्यों के साथ सड़क मरम्मत के अभियान में जुट जाते हैं। किसी के हाथ में कुदाल है तो कोई फावड़ा, गैंता और सब्बल लेकर रास्ते को दुरुस्त करने में लगा है। ग्रामीण आपस में मिलकर मिट्टी काट रहे हैं, ऊबड़-खाबड़ हिस्सों को समतल कर रहे हैं और आवागमन में होने वाली परेशानियों को कम करने का प्रयास कर रहे हैं। इस अभियान में गांव के लगभग सभी परिवार अपनी भागीदारी निभा रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जब वर्षों तक उनकी समस्या सुनने वाला कोई नहीं मिला, तो उन्होंने सामूहिक रूप से श्रमदान कर रास्ता बनाने का फैसला किया।
बरसात के बाद हर साल खुद करनी पड़ती है रास्ते की मरम्मत
ग्रामीणों के मुताबिक, हेसाकोचा गांव तक पहुंचने वाला रास्ता लंबे समय से बदहाल है। खासकर बरसात के दिनों में स्थिति और भी खराब हो जाती है। जंगल के बीच से गुजरने वाला रास्ता जगह-जगह क्षतिग्रस्त हो जाता है, जिससे ग्रामीणों का आवागमन मुश्किल हो जाता है। बारिश समाप्त होने के बाद प्रत्येक वर्ष ग्रामीणों को अपने स्तर से श्रमदान कर रास्ते की मरम्मत करनी पड़ती है। कई बार जनप्रतिनिधियों और संबंधित अधिकारियों के समक्ष सड़क निर्माण की मांग रखी गई, लेकिन अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है। इसी उपेक्षा से परेशान होकर ग्रामीणों ने इस बार भी खुद ही रास्ते को ठीक करने का निर्णय लिया है।
बीमार मरीजों और गर्भवती महिलाओं की बढ़ जाती है परेशानी
सड़क की समस्या केवल आवागमन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह गांव के लोगों के स्वास्थ्य और जीवन से भी जुड़ी हुई है। गांव में जब कोई व्यक्ति गंभीर रूप से बीमार पड़ता है या किसी गर्भवती महिला को अस्पताल पहुंचाने की जरूरत होती है, तब परिजनों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो जाती है। सड़क की सुविधा नहीं होने के कारण मरीजों को खाट पर लादकर लगभग पांच किलोमीटर तक पैदल ले जाना पड़ता है। इसके बाद ही उन्हें वाहन या अन्य साधन उपलब्ध हो पाता है। इस पूरी प्रक्रिया में काफी समय लग जाता है। ऐसे हालात में आपातकालीन चिकित्सा सुविधा प्राप्त करना भी मुश्किल हो जाता है।
बच्चों और बुजुर्गों के लिए भी परेशानी का सबब है जर्जर रास्ता
गांव के लोगों को रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। बच्चों की पढ़ाई, बुजुर्गों का आवागमन और जरूरी सामान लाने-ले जाने में सड़क की बदहाली बाधा बनती है। ग्रामीणों का कहना है कि सड़क जैसी बुनियादी सुविधा के अभाव में गांव का विकास प्रभावित हो रहा है। जंगल के बीच बसे इस गांव के लोगों को आज भी बेहतर आवागमन के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
श्रमदान से अस्थायी राहत, पक्की सड़क ही स्थायी समाधान
ग्रामीणों की एकजुटता और श्रमदान की भावना निश्चित रूप से सराहनीय है, लेकिन यह तस्वीर सरकारी व्यवस्था के सामने कई सवाल भी खड़े करती है। आखिर आजादी के इतने वर्षों बाद भी ग्रामीणों को बुनियादी सड़क सुविधा के लिए खुद कुदाल और फावड़ा उठाने की जरूरत क्यों पड़ रही है? ग्रामीणों का कहना है कि सामूहिक मेहनत से वे फिलहाल रास्ते को किसी तरह आवागमन योग्य बना सकते हैं, लेकिन हर साल इसी तरह मरम्मत करना स्थायी समाधान नहीं है।
हेसाकोचा गांव के ग्रामीणों ने प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से मांग की है कि उनकी समस्या को गंभीरता से लेते हुए गांव तक पक्की सड़क का निर्माण कराया जाए, ताकि बरसात के मौसम में आवागमन बाधित न हो और बीमार मरीजों, गर्भवती महिलाओं, बच्चों तथा बुजुर्गों को परेशानी का सामना नहीं करना पड़े। अब देखना यह है कि ग्रामीणों के इस सामूहिक श्रमदान और उनकी वर्षों पुरानी मांग पर प्रशासन कब तक ठोस पहल करता है।
Author: Ashish Yadav
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