नहीं रहीं रुपी सोरेन, संघर्षों के बीच परिवार को संभालने वाली थीं सोरेन परिवार की धुरी
शिबू सोरेन के आंदोलनकारी दौर से लेकर हेमंत सोरेन के राजनीतिक सफर तक परिवार को दिया संबल
रांची। झारखंड की राजनीति के सबसे प्रभावशाली सोरेन परिवार की धुरी मानी जाने वाली रुपी सोरेन का बुधवार रात निधन हो गया। वे झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं झामुमो के संस्थापक शिबू सोरेन की पत्नी और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मां थीं। लंबे समय से अस्वस्थ रुपी सोरेन का रांची के बरियातू स्थित हिल व्यू अस्पताल में इलाज चल रहा था। उनके निधन की खबर से झारखंड में शोक की लहर है।
रुपी सोरेन का जीवन राजनीतिक चमक-दमक से दूर रहकर संघर्ष, परिवार और जिम्मेदारियों के बीच बीता। शिबू सोरेन के लंबे आंदोलनकारी और राजनीतिक जीवन के दौरान उन्होंने परिवार की पूरी जिम्मेदारी संभाली और बच्चों की परवरिश की। यही वजह रही कि उन्हें सोरेन परिवार को एकजुट रखने वाली ‘धुरी’ के रूप में याद किया जाता रहा।
चांडिल से नेमरा तक का सफर
रुपी सोरेन का जन्म करीब 1942-43 के आसपास माना जाता है। उनका मायका जमशेदपुर के चांडिल क्षेत्र में था और विवाह से पहले उनका नाम रुपी किस्कू था। 1 जनवरी 1962 को उनका विवाह रामगढ़ जिले के नेमरा गांव निवासी शिबू सोरेन से हुआ।
विवाह के बाद ही शिबू सोरेन की गिरफ्तारी हो गई और उन्हें हजारीबाग जेल भेज दिया गया। उस समय रुपी सोरेन नई-नई दुल्हन थीं और परिवार की आर्थिक स्थिति भी मजबूत नहीं थी। उन्होंने ग्रामीणों से मदद मांगी और अपने मायके जाकर पिता से गुहार लगाई। इसके बाद पिता के साथ हजारीबाग पहुंचकर पति को जेल से छुड़ाने का प्रयास किया और उन्हें नेमरा लेकर लौटीं।
आंदोलन के दौर में संभाली घर की जिम्मेदारी
झारखंड आंदोलन और साहूकारों के खिलाफ शिबू सोरेन की लड़ाई के दौर में रुपी सोरेन को भी कई मुश्किल परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। जब शिबू सोरेन लंबे समय तक घर से दूर रहते थे, तब नेमरा स्थित घर और परिवार की जिम्मेदारी रुपी सोरेन के कंधों पर रहती थी।
शिबू सोरेन के आंदोलन के कारण जब पुलिस अक्सर घर पहुंचकर पूछताछ करती थी, तब भी उन्होंने मजबूती से परिस्थितियों का सामना किया। परिवार और जमीन-जायदाद की रक्षा के लिए उनके संघर्ष की कई घटनाएं आज भी सोरेन परिवार के पुराने संघर्षों से जुड़ी स्मृतियों में दर्ज हैं।
बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी
शिबू सोरेन के आंदोलन और बाद में राजनीति में सक्रिय रहने के दौरान रुपी सोरेन ने परिवार और बच्चों की जिम्मेदारी संभाली। उनके बड़े बेटे दुर्गा सोरेन झामुमो के प्रमुख नेताओं में शामिल हुए और जामा से विधायक रहे। वर्ष 2009 में उनका निधन हो गया।
दूसरे बेटे हेमंत सोरेन वर्तमान में झारखंड के मुख्यमंत्री हैं, जबकि छोटे बेटे बसंत सोरेन दुमका से विधायक हैं। उनकी बेटी अंजनी/अंजली सोरेन भी परिवार का हिस्सा हैं।
राजनीति में भी आजमाई किस्मत
रुपी सोरेन ने परिवार की जिम्मेदारियों तक खुद को सीमित नहीं रखा। 1999 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने झामुमो के टिकट पर दुमका (एसटी) लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा। इस चुनाव में उन्हें 1,96,493 वोट मिले, जबकि भाजपा के बाबूलाल मरांडी को 2,01,141 वोट प्राप्त हुए। वह करीब 4,650 मतों के अंतर से चुनाव हार गईं।
इसके बाद उन्होंने खरसावां विधानसभा सीट से अर्जुन मुंडा के खिलाफ चुनाव लड़ने की इच्छा जताई थी, हालांकि बाद में उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा।
परिवार के सुख-दुख में हमेशा रहीं साथ
रुपी सोरेन अपने परिवार के सुख-दुख में हमेशा मजबूती से साथ खड़ी रहीं। जून 2024 में जेल से रिहा होकर हेमंत सोरेन जब घर पहुंचे तो रुपी सोरेन ने उनका तिलक लगाकर स्वागत किया था। नवंबर 2024 में हेमंत सोरेन के शपथ ग्रहण समारोह में भी वे व्हीलचेयर पर पहुंची थीं।
जून 2026 में उन्होंने अपने दिवंगत पति शिबू सोरेन को मरणोपरांत प्रदान किए गए पद्म भूषण सम्मान को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से ग्रहण किया था। यह उनके सार्वजनिक जीवन के अंतिम महत्वपूर्ण अवसरों में से एक रहा।
लंबे समय से थीं अस्वस्थ
शिबू सोरेन के निधन के बाद से रुपी सोरेन की तबीयत लगातार खराब चल रही थी। सितंबर 2026 में बेहतर इलाज के लिए उन्हें हैदराबाद और बेंगलुरु भी ले जाया गया था। इसके बाद 18 सितंबर 2026 को छाती और फेफड़ों में संक्रमण तथा सांस लेने में परेशानी के बाद उन्हें रांची के हिल व्यू अस्पताल में भर्ती कराया गया। हालत बिगड़ने पर उन्हें लाइफ सपोर्ट पर रखा गया।
बुधवार रात उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन के साथ झारखंड के राजनीतिक इतिहास से जुड़ी एक ऐसी शख्सियत भी विदा हो गईं, जिन्होंने स्वयं राजनीति की अग्रिम पंक्ति में रहते हुए नहीं, बल्कि परिवार और संघर्ष के बीच रहकर सोरेन परिवार की नींव को मजबूत बनाए रखा।
Author: Ashish Yadav
खबर वही जो सबको रखे आगे












