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राष्ट्रीय आदिवासी दिवस केवल उत्सव नहीं, अपने हक की हुंकार है। अब वक्त है कि भारत आदिवासी समाज को हाशिए से केंद्र में लाए।

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राष्ट्रीय आदिवासी दिवस विशेष

जंगल बोलेंगे, पहाड़ गरजेंगे, भारत बदलेगा

विक्की कुमार धान,राष्ट्रीय महासचिव, राष्ट्रीय आदिवासी छात्र संघ की कलम से

9 अगस्त का सूरज जब उगता है, तो यह केवल एक तारीख नहीं होती — यह एक चेतना है, एक पुकार है, एक शपथ है। यह दिन उन मूल निवासियों की आवाज़ को मुखर करता है, जिन्हें विकास की दौड़ में लगातार कुचला गया, जिन्हें बार-बार हाशिए पर धकेला गया।यह केवल आदिवासी समाज का दिन नहीं है, यह भारत की आत्मा का दिन है।संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित इस अंतरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस ने विश्व को यह समझाया कि सभ्यताओं का मूल किन्हीं महानगरों में नहीं, बल्कि उन जंगलों, पहाड़ों और नदियों में है, जहां मनुष्य और प्रकृति के बीच अबाध संबंध रहा है।

न्याय नहीं, अधिकार की वापसी चाहिए

भारत में बिरसा मुंडा, सिद्धो-कान्हू, रानी दुर्गावती जैसे महान आदिवासी नायकों की विरासत को केवल स्मारकों में बंद कर देने से काम नहीं चलेगा। सवाल यह है कि क्या भारत ने उनके सपनों को सच किया? संविधान ने पहचान दी, लेकिन प्रशासन और व्यवस्था ने पहचान छीनी।जंगल, जल और जमीन के स्वामित्व से लेकर बोली, भाषा और संस्कृति तक — आदिवासी समाज आज भी अपने वाजिब हक़ की लड़ाई लड़ रहा है। और अब वह सिर्फ प्रतिरोध नहीं कर रहा, वह पुनर्निर्माण की ओर बढ़ रहा है।

जब एक बाँसुरी टूटती है…

जब एक आदिवासी विस्थापित होता है, तो केवल घर नहीं जाता, उसके साथ जाती हैं — उसकी स्मृतियाँ, उसकी संस्कृति, उसकी पूजा-पद्धति, उसकी भाषा, उसका विश्वास।
यह केवल सामाजिक अन्याय नहीं है, यह एक सांस्कृतिक नरसंहार है, जो वर्षों से जारी है।आज अगर नीति आयोग कहता है कि आदिवासी सबसे गरीब हैं, तो उसे यह भी कहना होगा कि आदिवासी सबसे ज़्यादा लूटे गए हैं — संसाधनों के नाम पर, विकास के नाम पर, और वोटों की राजनीति के नाम पर।

नया भारत: जहां हाशिए नहीं, समानता होगी

आदिवासी अब मुख्यधारा में विलीन नहीं होना चाहते, वे अपनी धारा को राष्ट्रीय धारा में बदलने की बात कर रहे हैं। वे विश्वविद्यालयों में अपनी भाषा के लिए लड़ रहे हैं, डिजिटल शिक्षा के लिए गांवों में प्रयास कर रहे हैं, और सांस्कृतिक अस्मिता को फिर से परिभाषित कर रहे हैं।आज आदिवासी महिलाएं नेता बन रही हैं — वे पितृसत्ता और सत्ता दोनों से लड़ रही हैं, और जीत रही हैं। यह चेतना भारतीय गणराज्य की शक्ति है, खतरा नहीं।

अब वक्त है सामाजिक अनुबंध का

सरकारें योजनाएं बनाती रहेंगी, लेकिन जब तक आदिवासी समाज निर्णय लेने की प्रक्रिया में समान भागीदार नहीं बनेगा, तब तक बदलाव अधूरा रहेगा।
ग्राम सभाएं केवल औपचारिकता नहीं, संविधान की जीवंत इकाई बननी चाहिए। पेसा और वनाधिकार कानून केवल दस्तावेज़ नहीं, जमीन पर लागू होने चाहिए।

यह केवल एक दिवस नहीं, एक एलान है

आदिवासी अब भारत से नहीं, भारत को अपने साथ चलने को कह रहे हैं।और यह यात्रा तब ही पूरी होगी, जब इस देश की संसद, न्यायालय, नीतियों और जन-मन में आदिवासी समाज बराबरी के साथ रहेगा।तो आइए, आज 9 अगस्त को हम केवल आदिवासी दिवस न मनाएं, बल्कि यह शपथ लें —अब इतिहास नहीं दोहराया जाएगा, अब नई इबारत लिखी जाएगी।

Ashish Yadav

Author: Ashish Yadav

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