हिंदू होकर निभा रहे हैं मुस्लिम परंपरा, हजारीबाग के अंतू साव बनें गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल
रिपोर्ट: आशीष यादव
जेलमा,हज़ारीबाग़:-जहां आज के दौर में धर्म के नाम पर नफरत की दीवारें खड़ी करने की कोशिश हो रही है, वहीं हजारीबाग के अंतू साव इंसानियत और मोहब्बत का पुल बनकर सामने आ रहे हैं।कटकमसांडी प्रखंड के जेलमा गांव निवासी अंतू साव हर साल मोहर्रम पर ताजिया निकालते हैं, और इस परंपरा को अपनी तीन पीढ़ियों से निभा रहे हैं।
मोहर्रम में ताजिया, मगर मजहब से ऊपर इंसानियत
हर साल जब अंतू साव ताजिया लेकर छड़वा मैदान पहुंचते हैं, तो देखने वालों की भीड़ उमड़ पड़ती है। उनकी बनाई ताजिया सिर्फ शिल्प की मिसाल नहीं होती, बल्कि हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक बन जाती है।अगर ताजिया उठाने से मोहब्बत बढ़ती है, तो हर साल उठाऊंगा।” — अंतू साव।जहां कई लोग उनके इस कार्य पर सवाल खड़े करते हैं, ताने कसते हैं, वहां अंतू साव अपने उसूलों पर डटे रहते हैं। उनके अनुसार,”इंसानियत और भाईचारा ही सबसे बड़ा धर्म है। मजहब की दीवारें हमारे लिए मायने नहीं रखतीं।”
गंगा-जमुनी तहज़ीब को जिंदा रखने की ज़िद
अंतू साव के पूर्वजों ने इस परंपरा की शुरुआत की थी और आज भी यह सिलसिला कायम है। ताजिया उठाने के पीछे कोई धार्मिक दिखावा नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक साझेदारी और आपसी सौहार्द की मिसाल है।वे यह साबित करते हैं कि”मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना” — ये महज कविता नहीं, उनके जीवन की हकीकत है।
राज्य भर के लिए मिसाल बनते जा रहे हैं अंतू साव
जब देश में धर्म के नाम पर नफरत फैलाने की कोशिशें हो रही हैं, तब अंतू साव जैसे लोग उम्मीद की रौशनी हैं। वे याद दिलाते हैं कि धर्म बांटने का नहीं, जोड़ने का माध्यम है।हजारीबाग ही नहीं, बल्कि पूरे झारखंड के लिए उनका यह कार्य एक प्रेरणा और मिसाल बन चुका है।



