हजारीबाग भवन निर्माण विभाग की टेंडर प्रक्रिया पर उठे सवाल, काम पहले या टेंडर बाद में?h
11 निर्माण कार्यों के लिए टेंडर, तीन कामों को लेकर संवेदकों के बीच चर्चा; करीब 1.40 करोड़ रुपये के कार्यों पर उठ रहे सवाल
रिपोर्ट :आशीष यादव
हजारीबाग। गणित का सामान्य नियम है कि एक के बाद दो आता है, लेकिन हजारीबाग भवन निर्माण विभाग से जुड़े कुछ निर्माण कार्यों को लेकर ऐसी स्थिति सामने आने की बात कही जा रही है, जिसमें टेंडर प्रक्रिया से पहले ही काम कराए जाने के आरोप लग रहे हैं। इसके बाद उन्हीं कार्यों के लिए टेंडर जारी किए जाने की बात सामने आई है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और विभाग का आधिकारिक पक्ष सामने आना बाकी है।
11 निर्माण कार्यों के लिए निकाला गया टेंडर
जानकारी के अनुसार, भवन निर्माण विभाग, हजारीबाग की ओर से कुल 11 निर्माण कार्यों के लिए टेंडर जारी किया गया है। टेंडर प्रक्रिया शुरू होने के बाद कुछ संवेदकों के बीच तीन कार्यों को लेकर चर्चा शुरू हुई। दावा किया जा रहा है कि इन तीनों कार्यों में से कुछ का काम टेंडर प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही जमीन पर कराया जा चुका है।
यदि यह दावा सही है तो सवाल उठता है कि टेंडर प्रक्रिया पूरी होने से पहले निर्माण कार्य किस आदेश अथवा नियम के तहत शुरू कराया गया। साथ ही, जिस कार्य का टेंडर बाद में जारी किया गया, उसकी शुरुआत पहले कैसे हुई, यह भी जांच का विषय बनता है।
करीब 1.40 करोड़ रुपये के तीन कार्य
बताया जा रहा है कि विवाद में बताए जा रहे तीनों कार्यों की कुल अनुमानित लागत करीब 1 करोड़ 40 लाख रुपये है। आरोप यह भी है कि इन कार्यों को एक ही संवेदक विजय सिंह को दिए जाने की तैयारी है। हालांकि, टेंडर प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार तीनों कार्यों में दो-दो संवेदकों के भाग लेने की बात सामने आ रही है। इनमें से एक को लेकर कुछ संवेदकों द्वारा ‘डमी’ होने का आरोप लगाया जा रहा है। इन आरोपों की भी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि टेंडर में वास्तविक प्रतिस्पर्धा हो रही है या नहीं।
टेंडर से पहले काम शुरू होने पर उठे सवाल
सरकारी निर्माण कार्यों में टेंडर प्रक्रिया का उद्देश्य प्रतिस्पर्धी दरों के माध्यम से सरकारी धन का उचित इस्तेमाल सुनिश्चित करना और निर्धारित नियमों के अनुसार कार्य कराना होता है। ऐसे में यदि किसी निर्माण कार्य को टेंडर प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही शुरू करा दिया गया है, तो संबंधित विभागीय प्रक्रिया की जांच जरूरी हो जाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी स्थिति में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि निर्माण कार्य शुरू करने का आदेश किस स्तर से जारी हुआ, कार्य की प्रशासनिक एवं तकनीकी स्वीकृति कब मिली और टेंडर प्रक्रिया की वर्तमान स्थिति क्या है।
मुख्यमंत्री सुइट के रिनोवेशन का काम भी सूची में
बताया गया है कि विभाग की इसी टेंडर सूची में करीब 46 लाख रुपये की लागत से मुख्यमंत्री सुइट के रिनोवेशन का कार्य भी शामिल है। इसके अलावा डीसी आवास में गोपनीय कक्ष और विजिटर रूम के रिनोवेशन का कार्य भी सूची में बताया जा रहा है।
इस कारण मामला केवल टेंडर प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि संबंधित सरकारी भवनों में काम कब शुरू हुआ और टेंडर प्रक्रिया के साथ उसका क्या संबंध है।
प्रतिशत के कथित खेल की भी चर्चा
भवन निर्माण विभाग की टेंडर प्रक्रिया को लेकर संवेदकों के बीच 2 प्रतिशत, 5 प्रतिशत और 10 प्रतिशत से जुड़े कथित लेनदेन की चर्चाएं होने की बात कही जा रही है। हालांकि, इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और इसे किसी व्यक्ति या अधिकारी के खिलाफ प्रमाणित आरोप के रूप में नहीं माना जा सकता।
मामले में वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए विभागीय रिकॉर्ड, कार्यादेश, प्रशासनिक एवं तकनीकी स्वीकृति, मापी पुस्तिका और टेंडर प्रक्रिया की जांच महत्वपूर्ण होगी।
विभाग से इन सवालों के जवाब अपेक्षित
पूरे मामले में भवन निर्माण विभाग से यह स्पष्ट होना अपेक्षित है कि संबंधित तीनों कार्यों की शुरुआत कब हुई? क्या टेंडर जारी होने से पहले किसी स्तर से कार्यादेश दिया गया था? यदि काम पहले शुरू हुआ तो किस नियम या सक्षम प्राधिकारी के आदेश के तहत हुआ? टेंडर में शामिल संवेदकों की प्रतिस्पर्धा किस प्रकार सुनिश्चित की गई?साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि यदि किसी कार्य का कुछ हिस्सा टेंडर से पहले कराया गया है, तो उसकी मापी और भुगतान की प्रक्रिया किस आधार पर होगी।
Author: Ashish Yadav
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