शिबू सोरेन: ‘दिशोम गुरु’ का संघर्ष और स्वाभिमान से भरा जीवन

राष्ट्रीय समाचार डेस्क:झारखंड की राजनीति और आदिवासी समाज के सबसे बड़े नेताओं में शुमार शिबू सोरेन का 81 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। ‘दिशोम गुरु’ के नाम से लोकप्रिय शिबू सोरेन ने अपने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन आदिवासी अधिकारों की लड़ाई से वे कभी पीछे नहीं हटे।उनका जन्म 11 जनवरी 1944 को तत्कालीन बिहार (अब झारखंड) के नेमरा गांव, हजारीबाग (अब रामगढ़) जिले में एक सामान्य आदिवासी परिवार में हुआ।
पिता सोबरन सोरेन एक शिक्षक और समाजसेवी थे, जो ग्रामीणों को शिक्षा और अधिकारों के लिए जागरूक करते थे। लेकिन 27 नवंबर 1957 को महाजनों द्वारा उनके पिता की हत्या ने शिबू सोरेन के जीवन की दिशा बदल दी।

‘धनकटनी आंदोलन’ से लेकर झामुमो की नींव तक

पढ़ाई छोड़कर सामाजिक संघर्ष की राह पर बढ़े शिबू सोरेन ने 1970 के दशक में महाजनों के खिलाफ ‘धनकटनी आंदोलन’ चलाया, जिसने आदिवासी चेतना को नई ऊर्जा दी। 4 फरवरी 1973 को उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) की स्थापना की, जिसने झारखंड अलग राज्य आंदोलन को नई धार दी।
राजनीतिक सफर और विवादों की छाया
1980 में पहली बार दुमका से लोकसभा पहुंचे शिबू सोरेन आठ बार सांसद रहे और तीन बार केंद्र में कोयला मंत्री बने। हालांकि, चिरुडीह नरसंहार (1975) और अन्य मामलों में उन पर लगे आरोपों के चलते उन्हें 2004 में मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।झारखंड के मुख्यमंत्री के रूप में वे 2005, 2008 और 2009 में तीन बार पद पर आसीन हुए, लेकिन बहुमत साबित न कर पाने के कारण कार्यकाल संक्षिप्त रहा। बावजूद इसके, राज्य निर्माण में उनकी भूमिका ऐतिहासिक मानी जाती है।
निधन और एक युग का अंत
लंबे समय से बीमार चल रहे शिबू सोरेन को हाल ही में दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
जहां 4 अगस्त 2025 को ब्रेन स्ट्रोक और किडनी फेलियर के कारण उनका निधन हो गया। उनके जाने से झारखंड की राजनीति में एक युग का अंत हो गया।
दिशोम गुरु की विरासत
शिबू सोरेन का जीवन संघर्ष, आदिवासी हितों के लिए समर्पण और सामाजिक न्याय की लड़ाई का प्रतीक रहा। उनके पुत्र हेमंत सोरेन, जो वर्तमान में झारखंड के मुख्यमंत्री हैं, इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
Author: Rashtriy Samachar
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