लुप्त होती विरासत: खेतों में नहीं गूंजते धनरोपनी के गीत, मशीनों और फूहड़ संगीत ने छीना सुरों का सौंदर्य!

आशीष यादव की कलम से

चुरचू/चरही (हजारीबाग):-एक दौर था, जब सावन की फुहारों के साथ ही खेतों में महिलाओं की झूमर, पुरवइया, निर्गुण और सोंठी जैसी लोकगीतों की गूंज हर तरफ सुनाई देती थी। धनरोपनी का समय गांवों में सिर्फ खेती का नहीं, बल्कि उत्सव का प्रतीक होता था। लेकिन अब यह संस्कृति धीरे-धीरे मशीनी युग के शोर में खोती जा रही है।आज की तस्वीर बिल्कुल अलग है — हल और बैलों की जगह ट्रैक्टर ने ले ली है, और लोकगीतों की जगह मोबाइल में बजते फूहड़ गानों ने। खेतों में काम करने वाले अब संगीत से जुड़ने की जगह मशीनों और मजदूरी के घंटे गिनने लगे हैं। रोपनहार महिलाएं बताती हैं कि पहले रोपनी के समय खेतों में गीतों का मुकाबला होता था, महिला और पुरुष आपस में तुकबंदी करते, झूमते, हंसते और मेहनत को भी आनंद में बदल देते थे। आज वह सब कहीं खो गया है।
पनवा देवी, एक बुजुर्ग रोपनहार, कहती हैं – “पहले खेत मालिक खुद हल लेकर उतरते थे। बैलों के गले की घंटी बजती थी और हम गीत गाते हुए धान लगाते थे। अब ट्रैक्टर बजता है और मोबाइल से अश्लील गाने सुनाई देते हैं।”धान की रोपनी से पहले पूजा-पाठ, इष्टदेव को भोग और प्रसाद देना, खेतों की आरती करना – ये सब आज केवल बुजुर्गों की यादों में बचे हैं। कभी रसिया (गुड़ से बनी खीर) और पूड़ी का भोज पड़ोसियों को खिलाया जाता था, अब उसकी जगह प्लास्टिक की बोतल में पानी और मजदूरी की बात होती है।
रोपनहार रूबी कुमारी बताती हैं कि अब 300-400 रुपये तक मेहनताना मिल जाता है, लेकिन पहले जैसा मान-सम्मान और अपनापन नहीं रहा। ममता देवी भी मानती हैं कि पहले के मुकाबले काम आसान हुआ है, लेकिन वह आत्मीय माहौल और लोकगीतों की बात ही कुछ और थी, जो अब नहीं रही।आज की चिंता यह है कि यह परंपरा आने वाली पीढ़ियों को नहीं मिल पाएगी, क्योंकि न तो वे गीत अब सुनाई देते हैं और न ही उनका अभ्यास कोई करता है।

Author: Rashtriy Samachar
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