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मांदर की थाप और सरहुल की धूम: क्यों मनाया जाता है प्रकृति पर्व ‘सरहुल’, क्या हैं इसके मायने?

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प्रकृति महापर्व सरहुल की धूम, अखड़ा में उमड़ी आस्था की भीड़

पांच गांवों ने मिलकर की मां सरना की परिक्रमा, अच्छी वर्षा और समृद्धि की कामना।

राष्ट्रीय समाचार डेस्क:चैत्र महीने के पावन अवसर पर झारखंड सहित पूरे आदिवासी क्षेत्र में प्रकृति महापर्व सरहुल की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। पर्व से एक दिन पहले आदिवासी समाज के लोग पारंपरिक अखड़ा स्थल पर एकत्र होकर सरना धर्म के अनुसार विधि-विधान से प्रकृति और वन-देवताओं की पूजा-अर्चना कर रहे हैं।शुक्रवार को सरना अखड़ा स्थल पर पांच गांवों के लोगों ने एक साथ मां सरना की परिक्रमा की और अच्छी वर्षा व समृद्ध कृषि की कामना की। पूजा के दौरान पारंपरिक नियमों का सख्ती से पालन किया गया, जिनका सीधा संबंध प्रकृति से जुड़ा होता है। इसमें घड़े में पानी रखकर उसके स्तर के आधार पर वर्षा का अनुमान लगाने की परंपरा भी शामिल है।सरहुल पर्व में पारंपरिक रूप से बलि की भी प्रथा निभाई जाती है। यह पर्व आदिवासी समाज के प्रकृति प्रेम, आस्था और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक माना जाता है। इस वर्ष सरहुल पर्व 21 मार्च को मनाया जाएगा।

क्या है सरहुल का महत्व?

सरहुल झारखंड, बिहार, ओडिशा और पश्चिम बंगाल की जनजातियों—उरांव, मुंडा, हो और संथाल—का प्रमुख प्रकृति पर्व है। यह वसंत ऋतु में चैत्र शुक्ल तृतीया को मनाया जाता है और नए साल की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। साथ ही इसे धरती और सूर्य के मिलन (विवाह) का प्रतीक भी माना जाता है।

इस दौरान सखुआ (साल) के फूलों की पूजा की जाती है और मांदर-नगाड़ों की थाप पर पारंपरिक नृत्य-गान होता है। लोग पारंपरिक वेशभूषा में सज-धज कर इस उत्सव में भाग लेते हैं।सरहुल केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आभार, संरक्षण और सामूहिक एकता का संदेश देने वाला महापर्व है, जिसमें सभी समुदाय के लोग मिलकर भाग लेते हैं।

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Author: Rashtriy Samachar

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