पत्रकारिता की सीमाएं: रिपोर्टर बने रहें, पक्षकार न बनें

ऐसे पत्रकार जो सत्ता से सवाल पूछते हैं और राजनीतिक मामलों में विश्लेषण करते हैं, उन्हें अक्सर दर्शक “मसीहा” समझने लगते हैं। लोग उम्मीद करते हैं कि पत्रकार उन नेताओं की जगह ले लें जिनसे वे नाराज़ हैं और उनकी समस्याओं का समाधान करें।
लेकिन यह खतरनाक भ्रम है—क्योंकि पत्रकार का काम समस्याओं का हल निकालना नहीं, बल्कि वस्तुस्थिति का आईना दिखाना है।पत्रकारिता की एक मूलभूत भूमिका है: सत्ता के सामने जनता की ओर से सवाल रखना। विपक्ष भी यही करता है, लेकिन पत्रकार और विपक्ष—दोनों के तौर-तरीकों और सीमाओं में ज़मीन–आसमान का फर्क है।दुनिया के वरिष्ठ पत्रकार वर्षों से चेताते आए हैं कि पत्रकारिता और एक्टिविज़्म/राजनीति के बीच की रेखा साफ होनी चाहिए। यदि किसी को राजनीति में जाना है तो पत्रकारिता का पेशा त्याग देना चाहिए। दोनों नावों पर एक साथ सफर न नैतिक रूप से सही है और न पत्रकारिता की दृष्टि से।

वाल्टर क्रोनकाइट: “तटस्थता नहीं, निष्पक्षता”

अमेरिका के दिग्गज पत्रकार वाल्टर क्रोनकाइट कहा करते थे—“Objective journalism and an opinion column are as different as the Bible and Playboy magazine.”
उनका मानना था कि कोई पत्रकार यदि किसी विचारधारा का “डॉगमेटिक” समर्थक बन जाए और उसे रिपोर्टिंग में ठूँस दे, तो वह अच्छा पत्रकार नहीं रह जाता।वियतनाम युद्ध पर निजी राय रखने के बावजूद क्रोनकाइट ऑब्जेक्टिविटी के सख्त हिमायती थे।
एडवर्ड आर. मरो: “विश्वसनीयता ही पत्रकार की पूँजी”
द्वितीय विश्वयुद्ध और मैकार्थी-युग की रिपोर्टिंग के लिए प्रसिद्ध एडवर्ड आर. मरो का कहना था—
“To be persuasive we must be believable; to be believable we must be credible; to be credible we must be truthful.”मरो ने टीवी को सिर्फ मनोरंजन का माध्यम बनने से रोकने की चेतावनी दी। वे मैकार्थी के खिलाफ खड़े हुए, लेकिन कभी एक्टिविस्ट नहीं बने—वे तथ्यों के प्रति प्रतिबद्ध रहे।
क्रिस्टियाने अमानपुर: “सच्चाई की तरफ खड़े हों, पक्षकार न बनें”
CNN की चीफ इंटरनेशनल एंकर क्रिस्टियाने अमानपुर बोस्निया नरसंहार कवर करते समय आलोचना के बावजूद डटी रहीं। उन्होंने कहा—
“Sometimes there is no moral equivalence… We have to be truthful, not neutral.”अमानपुर मानती हैं कि पत्रकारिता का मतलब हर स्थिति में न्यूट्रल होना नहीं, बल्कि सच्चाई के प्रति ईमानदार रहना है।लेकिन यह “एक्टिविज़्म” नहीं—यह तथ्यपरक पत्रकारिता है।
SPJ कोड ऑफ एथिक्स: पत्रकार का प्रमुख दायित्व—जनता
“Society of Professional Journalists” (SPJ) कहता है—“Act Independently: Journalists should be free of obligation to any interest other than the public’s right to know.”“Avoid conflicts of interest… shun political involvement, public office.”मतलब पत्रकार को राजनीतिक दखल, लाभ और पद से दूर रहना चाहिए। यही स्वतंत्रता उसकी विश्वसनीयता की नींव है।
जो राजनीति में गए—उन्होंने पत्रकारिता छोड़ी
दुनिया में लगभग हर उदाहरण यही बताता है:
राजनीति में जाने वाले पत्रकार पहले पत्रकारिता से इस्तीफा देते हैं।
- बोरिस जॉनसन: राजनीति में आने से पहले पत्रकारिता छोड़ी।
- निकोलस क्रिस्टोफ (NYT): चुनाव लड़ने के लिए पद छोड़ा।
भारत में भी इस रेखा का धुंधलापन लगातार विवाद का कारण बन रहा है—रिपोर्टिंग और राय, पत्रकारिता और प्रचार, सब गड्डमड्ड होता जा रहा है, जिससे विश्वसनीयता पर गहरा असर पड़ा है।
पत्रकार से मसीहा बनने की उम्मीद क्यों गलत है
दर्शक अक्सर पत्रकारों से “समाधान” की उम्मीद करते हैं। लेकिन समाधान देना न पत्रकार का काम है, न उसकी भूमिका।
समाधान के रास्ते हैं—
- वोट
- राजनीति में भागीदारी
- आंदोलन
- जन दबाव
पत्रकार का काम सिर्फ इतना है कि जिन सूचनाओं को आप तक पहुँचने से रोकने का प्रयास किया जा रहा है—उन्हें निष्पक्ष रूप से उजागर करना।
अंत में: क्रोनकाइट की चेतावनी याद रखें
“हम तथ्यों के गवाह हैं, जज नहीं।
जज बनेंगे तो पत्रकारिता मर जाएगी।”पत्रकार यदि मसीहा बनने लगेंगे, तो वे पत्रकार नहीं रहेंगे।
और लोकतंत्र का चौथा स्तंभ भी नहीं।
Author: Rashtriy Samachar
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2 thoughts on “पत्रकारिता की सीमाएं: रिपोर्टर बने रहें, पक्षकार न बनें”
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