मणिपुर में मोदी का मायाजाल!

दो साल छह महीने बाद पहुंचे प्रधानमंत्री, गहरे जख्मों पर ‘पैकेज’ की मरहमपटी।

मणिपुर के लोग आज भी उस दर्द से जूझ रहे हैं जिसे शायद ही आने वाले वर्षों में भुला सकें। दो साल छह महीने तक जब राज्य गृहयुद्ध जैसे हालात से गुजरता रहा, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यहां न आना और न ही पीड़ितों के लिए सहानुभूति के दो शब्द कहना, राज्य की जनता को गहरी चोट पहुंचा गया।

संघर्ष की पृष्ठभूमि
मैतेई और कूकी समुदाय के बीच आरक्षण और जमीन के अधिकारों को लेकर शुरू हुआ यह संघर्ष धीरे-धीरे खूनी टकराव में बदल गया। कोर्ट द्वारा मैतेई को आदिवासी घोषित करने के बाद कूकी बहुल इलाकों की जमीन और संसाधनों पर कब्ज़े की आशंका बढ़ गई। आरोप है कि केंद्र सरकार इस विवाद का लाभ उठाकर खनिज संपन्न क्षेत्रों को उद्योगपतियों के हवाले करना चाहती है।इस संघर्ष में हजारों कूकियों के घर जले, सैकड़ों चर्च ध्वस्त किए गए और बड़ी संख्या में लोग पलायन कर मिजोरम या राहत शिविरों में शरण लेने को मजबूर हुए।
विपक्ष का रुख
जब केंद्र सरकार ने चुप्पी साध ली, तब कांग्रेस नेता राहुल गांधी तीन बार मणिपुर पहुंचे और पीड़ितों से मिले। उन्होंने भारत जोड़ो न्याय यात्रा की शुरुआत भी मणिपुर से की। उनकी उम्मीद थी कि केंद्र सरकार इन आवाजों को सुनेगी, लेकिन राहत और पुनर्वास की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
अब क्यों पहुंचे मोदी?
लंबे इंतजार और देशभर में हो रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच मोदी का अचानक मणिपुर पहुंचना और भारी-भरकम पैकेज की घोषणा करना, लोगों को चुनावी दांव जैसा लग रहा है। राज्य में राष्ट्रपति शासन के बावजूद पूर्व मुख्यमंत्री बीरेन सिंह के साथ उनकी मौजूदगी से यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि जल्द ही चुनाव की घोषणा हो सकती है।
जनता का रुख
मणिपुर की आम जनता का कहना है कि मोदी सरकार का देर से आया यह कदम महज़ ‘छवि सुधार अभियान’ है। राज्य की जनता उनके ‘मायाजाल’ में अब नहीं फंसने वाली। लोगों का कहना है कि “सच्ची परख तो मुश्किल वक्त में ही होती है, और उस वक्त मोदी हमारे साथ नहीं खड़े थे।”
Author: Rashtriy Samachar
खबर वही जो सबको रखे आगे











